कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज करने के, 400 साल पूरे होने के उपलक्ष्‍य में सन 1893 में विश्‍व मेले का आयोजन किया गया। इसी विश्‍व मेले का एक हिस्‍सा विश्‍व धर्म सम्‍मेलन था। इस विश्‍व मेले के आयोजन को लेकर अमेरिकी नगरों में इतनी होड़ थी कि अमेरिकी सीनेट में न्‍यूयॉर्क, वाॅशिंगटन, सेंट लुई और शिकागों के बीच मतदान कराना पड़ा, जिसमें शिकागों को बहुमत मिला। मिशिगन झील के किनारे 1037 एकड़ जमीन पर इस प्रदर्शनी में 2.75 करोड़ लोग आए थे। हर दिन करीब डेढ़ लाख से ज्‍यादा लोग आते थे। भारत की ओर से, स्‍वामी विवेकानंद इस धर्म सम्‍मेलन में शामिल हुए थे। उनके भाषण पर, आर्ट इंस्‍टीटयूट ऑफ शिकागों पूरे दो मिनट तक तालियों से गूंजता रहा। भारत के इतिहास में यह दिन गर्व और सम्‍मान के तौर पर दर्ज हैं। 

आइए पढ़ते हैं, अमर ज्ञान पुंज स्‍वामी विवेकानंद के उस ऐतिहासिक भाषण केे कुछ मुख्‍य अंश.....


विश्‍व धर्म सम्‍मेलन, शिकागों (11 सिंतबर 1893)

मेरे प्रिय अमेरिकावासी बहनों और भाइयों। आपने जिस स्‍नेह के साथ मेरा स्‍वागत किया है, उससे मेरा ह्रदय अपार हर्ष से भर गया हैं। मैं दुनिया की सबसे पुरानी संत परंपरा और सभी धर्मों की जननी की तरु से धन्‍यवाद देता हूं। सभी जातियों और संप्रदायों के लाखों-करोंड़ों हिंदुओं की तरफ से आपका आभार व्‍यक्‍त करता हूं। मैं इस मंच पर बोलने वाले कुछ वक्‍ताओं का भी धन्‍यवाद करना चाहता हूं जिन्‍होंने यह जाहिर किया कि दुनिया में सहिष्‍णुता का विचार पूरब के देशों से फैला हैं। मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्‍णुता और सार्वभौमिक स्‍वीकृति का पाठ पढ़ाया हैं।

 हम सिर्फ सार्वभौमिक सहिष्‍णुता पर ही विश्‍वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्‍वीकार करते हैं। मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं जिसने सभी धर्मो और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी। मुझे गर्व है कि हमने अपने दिल में इजराइल की वो पवित्र यादें सजों रखी हैं। जिनमें उनके धर्मस्‍थलों को रोमन हमलावरों ने तहस-नहस कर दिया था और फिर उन्‍होने दक्षिण भारत में शरण ली। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और लगातार अब भी उनकी मदद कर रहा हैं। मैं इस मौके पर वह श्‍लोक सुनाना चाहता हूं जो मैंने बचपन से याद किया और जिसे रोज करोड़ों लोग दोहराते हैं। 

''जिस तरह अलग-अलग जगहों से निकली नदियां, अलग-अलग रास्‍तों से होकर आखिरकार समुद्र में मिल जाती हैं। ठीक उसी तरह मनुष्‍य अपनी इच्‍छा से अलग-अलग रास्‍ते चुनता है ये रास्‍ते देखने मेंं भले ही अलग-अलग लगते हैं, लेकिन ये सब ईश्‍वर तक ही जाते हैं।'' 

मौजूदा सम्‍मेलन जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से हैं, वह अपने आप में गीता में कहे गए इस उपदेश का प्रमाण हैं। '' जो भी मुझ तक आता है, चाहे कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं, लोग अलग-अलग रास्‍ते चुनते है, परेशानियां झेलते हैं, लेकिन आखिर में मुझ तक पहुंचते हैं'' 

सांप्रदायिकता, कट्टरता और इसके भयानक वंशजों के धार्मिक हठ ने लंबे समय से इस खुबसूरत धरती को जकड़ रखा हैं। उन्‍होंने इस धरती को हिंसा से भर दिया है और कितनी ही बार यह धरती खून से लाल हो चुकी है न जाने कितनी सभ्‍यताएं तबाह हुईं और कितने देश मिटा दिए गए। यदि ये खौफनाक राक्षस नहीं होते तो मानव समाज कहीं ज्‍यादा बेहतर होता, जितना कि अभी है लेकिन उनका वक्‍त अब पूरा हो चुका है। मुझे उम्‍मीद है कि हम सम्‍मेलन का बिगुल सभी तरह की कट्टरता, हठधर्मिता और दुखों का विनाश करने वाला होगा, चाहे वह तलवार से हो या फिर कलम से। और सभी मनुष्‍यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।