सदगुरू
 लोग उनसे ज्‍यादा प्‍यार करते हैं जिन्‍हें उन्‍होंने नहीं देखा हैं बजाय उनके जिन्‍हें उन्‍होंने देखा हैं। वो सिनेमा जाते हैं। जो भी ये रजनीकांत या टॉम क्रूज या अमिताभ बच्‍चन वो बहुत बड़े आदमी हैं और लोग उनसे अपने बगल में बैठे लोगों से ज्‍यादा प्‍यार करते हैं। क्‍यूंंकि वो सब बढ़ाकर दिखाया है। है ना- क्‍यूंकि ये इतना एक्‍सजेरेटेड है, वो आदमी इतना बड़ा है वो इतना ऊँचा बोलता है और हर चीज जो वो करते हैं, वो बड़ी हैं। आपके बगल में बैठे लोग उतने बड़े नहीं दिखते। वो इतना ऊँचा नहीं बोल सकते, वो इतना बड़ा कुछ नहीं कर सकते। तो भ्रम एक एक्‍सजेरेटेड वास्‍तविकता है। और इसके कारण वो वास्‍तविकता से ज्‍यादा शक्तिशाली चीज बन सकती है। 

लेकिन एक बार आप उड़ कर भ्रम की स्थिति में जाते हैं। आप पगलपन के खतरे पर होते हैं। आप अपने मन की मूलभूत स्थिरता को खतरे में डाल रहे हैं। अगर आप बहुत दूर चले जाते हैं तो आप वापस भी नहीं आ सकते। अगर आप यहां बैठकर दो मिनट के लिए कुछ मजेदार सपना देख कर वापस आ सकते हैं। ये अच्‍छा हैं लेकिन आपने सपना देखना शुरू किया और आपको पता नहीं कि कहां रूकना हैं। फिर पागलपन है। है ना! तो एक बहुत स्थिर शरीर और मन कायम करना एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा है। 

अगर हम आध्‍यात्मिक पहलुओं की खोज करना चाहते है। हमें जानना चाहिए कि क्‍या कल्‍पना है और क्‍या नहीं? इसके लिए एक बहुत ज्‍यादा फोकस स्थिरता की जरूरत है। अब ये सरल चीज जाे आप कर रहें है की जागरूकता में इस तरह जम जाते हैं। और आपके पीछे आता हुआ दूसरा काल्‍पनिक दृश्‍य बनाते हैं। इसके लिए बहुत ज्‍यादा मानसिक मेहनत चाहिए। आप समझ रहे हैं, में क्‍या कह रहा हूँ? सिर्फ ये पक्‍का करना कि आपकी सांस सामान्‍य से थोड़ी गहरी हो। बहुत मानसिक मेहनत चाहिए। अगर आप अपने मन को इस तरह इस्‍तेमाल करते रहे तो मन बहुत स्थिर आधार बन जाता है। यह कोई काल्‍पनिक स्थिति नहीं है। ये अपने आप में एक ठोस आधार हैं। तंत्र की पूरी प्रणाली ऐसी हैं कि आप फिर उत्‍पन्‍न करते हैं।


 अगर आप ये गुलाब की पंखुड़ी ले मेरे ख्‍याल से हमने आपको इसके बारे में बताया है। है ना! बस एक गुलाब की पंखुड़ी को लीजिए। इसे जितना संभव हो उतना ध्‍यान से देखिए। अपने मन में उसे फिर से बनाइए। अगर आप चाहें तो आप गुलाब की पंखुडि़यां आसमान से नीचे गिरा सकते हैं। आपने इसे  इतनी डिटेल से देखा हैं आपने इसके हर मिलीमीटर हर माइक्रो मिलीमीटर को ध्‍यान से देखा हैं। और अब आप उसे बनाते हैं।


 देखिए अभी कोई पेंटिंग बना रहा है। ठीक है, ये कैसे- क्‍योंकि कहीं न कहीं उनके मन में उस पत्‍ते या फूल किसी भी चीज की छवि एकदम सटीक है। है ना! तो मन इसमें सक्षम है। अगर आप ऐसा काेई प्रभाव लेते हैं और इसमें अभिव्‍यक्ति करते है। धीरे-धीर आप इस तरह मन में ये अभ्‍यास करें। तो ये बहुत स्थिर और शक्तिशाली उपकरण बन जाता हैं। अब आप योग करते हैं, आप कहीं उड़कर नहीं जाते,  आप सिर्फ उसे स्थिर करते हैं, स्थिर करतें हैं, स्थिर करते हैं। अगर ये बहुत स्थिर हो तो आप इसमें कुछ भी उतार सकते हैं। अगर ये उतना स्थिर नहीं हैं तो फिर अगर कोई बड़ी चीज आपके पास आती है तो लोग टूट जाते हैं या पीछे हट जाते हैं। बहुत से लोग पीछे हट जाते हैं। जब भी बड़े अनुभव होते हैं, बहुत से लोग अगर उनके साथ कुछ बड़ा होता हैं तो वो उससे डर जाते हैं वो उससे बचने लगते है वो पीछे हट जाएंगे। लेकिन अगर उनके पास बहुत स्थिर दिमाग हाेगा तो जब भी कुछ बड़ा होगा, वाेे आगे बढ़ेंगे। ऐसा लोगों के साथ सिर्फ आध्‍यात्मिक प्रक्रिया और रहस्‍यपूर्ण आयामों में ही नहीं हो रहा। साधारण भौतिक जीवन में भी होता हैं। 

ज्‍यादातर मैं यह गौर करता हूँ कि अगर जीवन काम करता है, तो ज्‍यादातर लोग बहाेत ही मूर्ख बन जाते हैं। बहुत कम लोग अपनी दौलत और प्रभाव का अपनी खुशहाली के लिए इस्‍तेमाल करते हैं। ज्‍यादातर लोग मूर्खतापूर्ण हो जाते हैं वो सिर्फ इसलिए पीछे हटना चाहते है क्‍योंकि चीजें काम करने लगी। ऐसा नहीं होना चाहिए। अगर चीजें काम करती हैंं तो आपको आगेे बढ़ना चाहिए। है ना! लेकिन होगा ऐसा अगर हमारा सिस्‍टम तैयार नहीं है और चीजें आगेे बढ़ती हैं तो भौतिक रूप से या मनोवैज्ञानिक रूप से, या आध्‍यात्मिक रूप से, या जिस भी रूप से अगर हम तैयार नहीं हैं और कोई चीज आगे बढ़ती है तो हम पीछे हट जातेे हैं। ये स्‍वभाविक रूप से होता हैं यहां तक की आध्‍यात्मिक अनुभव भी लाेगों को पीछे की ओर ले जाते हैं। सिर्फ इसलिए क्‍योंकि जरूरी तैयारी और साधना नहीं हैं इसलिए ये हमेशा नियंत्रित होता हैं। 

जब भी हम काेई भव्‍य आध्‍यात्मिक अनुभव उत्‍पन्‍न करते हैं चाहे भाव स्‍पंदन या सम्‍यमा ध्‍यान विधि में तो वो बहुत नियंत्रित होता है। नियंत्रित मतलब वो एक जेल से ज्‍यादा निंयत्रित होता है। हां, उसे ऐसा ही होना चाहिए। अगर आप उसे छोड़ देंगे तो लोग तमाम चीजों पर उड़ने लगेंगे लेकिन वो उनके लिए अच्‍छा नहीं होगा वो उन्‍हें पीछे की तरफ ले जाएगा। देखिए ये एक सरल चीज है। आपके शरीर, भौतिक शरीर और आपके मन के बीच एक सूक्ष्‍मता है, के आपके मन मेंं जो हाेता है उसे उस तरह से नहीं समझा जा सकता। जिस तरह हम शारीरिक गातिविधियों को समझते हैं। है ना! आपकी भावनाओं में जो होता हैंं उसे आपके मन की गतिविधियों की तरह तार्किक रूप से नहीं समझा जा सकता। है ना! जैसे जैसे चीजें सूक्ष्‍म होती जाती हैं वो तार्किक प्रक्रिया के लिए कम से कम उपलब्‍ध होती हैं। अगर हम इस तर्क को नहीं समझते। अगर आप हर चीज को उस तरह संभालने की कोशिश करते हैं। जैसे आप भौतिक चीजों को सँभालते है, तो इंसान मर जाएंगे। अगर आप इंसानों को भौतिक चीजों की तरह संभालने की कोशिश करते हैं। तो आप देखेंगे कि कोई भी आपके साथ नहीं होगा। है ना! क्‍या आप इंसानों को संभालने के लिए भौतिक नियमों में ढील नहीं देते। 

कोई दूर है, ठीक है आप कहते है, एक दो तीन चार, चार लोग। लेकिन अगर वो आपके घर में है, आपके परिवार की तरह, तो क्‍या आप उनसे बातचीत के लिए भौतिक नियमों को रिलैक्‍स नहीं करेंगे। अगर आप नहीं करते तो आप धरती पर किसी इंसान को नहीं जान पाएंगे। तो इस ढील को आगे बढ़ाना होगा। जैसा की कहा जाता है अगर आपके जीवन को विकास करना है। तो आपको ज्‍यादा से ज्‍यादा चीजों को इससे मुक्‍त करना होगा। लेकिन इसके लिए आपके पास बहुत स्थिर तार्किक दिमाग होना चाहिए। अगर आपके पास वो नहीं है तो आप भ्रम की प्रक्रियाओं में भटक जाएंगे। आध्‍यात्मिक प्रकिया में ऐसा होता है कि अगर आप एक बहुत स्थिर शरीर और स्थिर मन कायम करते हैंं तो हम आपको अतार्किक चीजों के अनुभव में ले जा सकते हैं। अगर आप इसे कायम नहीं करते अगर हम आपको एक अतार्किक अनुभव में ले जाते हैं। उसके बाद आपकी कल्‍पना इस तरह भागेगी। कि आप भ्रम में  पड़ जाएंगे और सोचेंगे कि यही असली है। भ्रम असली से कहीं ज्‍यादा शक्तिशाली है। असल में वो है क्‍यूंकि वो एक्‍सजेरेटेड है। 

      
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