आचार्य रजनीश ओशो

जीवन की जो मौलिक समस्‍या है - अशांति की, दुख की, पीड़ा की वो स्‍त्री और पुरूष के लिए अलग-अलग नहीं हैं। पहले तो मैं उस मौलिक समस्‍या के संबंध में थोड़ी सी बात मैं आपसे कहूँ। जो सभी की हैं। और जो कुछ प्रश्‍न पुछे हुए हैं। जो शायद स्‍त्रीयों के लिए ही विशेष अर्थ के होंगे, उनकी भी बात करुँगा। 

मनुष्‍य के जीवन में इतनी घनीभूत अशांति हैंं। इतनी पीड़ा हैं, इतना दुख हैं। की जो लोग भी विचार करते हैं। उन्‍हें ये अनुभव होगा। जीवन की व्‍यर्थतता का अनुभव होगा। ज्ञात होगा की जैसे जीवन में कोई अर्थ नहीं। हम जीते हैं, केवल इसलिए कि मरने में समर्थ नहीं हैं। जीये जाते हैंं और मृत्‍यु की प्रतीक्षा भी करते हैं। इस भां‍ति जीना इतना व्‍यर्थ और बोझिल हैं कि करीब - करीब जीते जी हम मुर्दोंं की ही भांति हो जाते हैं। कोई रस, कोई आनंद, कोई जीवन में नृत्‍य और कोई संगीत नहीं रह जाता। वो सब भी नष्‍ट हो जाते हैं। जैसे किसी पौधे काेे हम उखाड़ लेंं, उसकी जड़े टूट जाएं और पौधा उम्‍हढ़ा जाएं। उसके फूल मुरझा जाएं। करीब - करीब मनुष्‍य का जीवन ऐसा हो गया हैंं। उसकी सारी जड़े टूट गयी हैंं जमीन सेे, इसलिए न तो ऐसी आंखे दिखाई पड़ती हैं जो साथ हों, न तो ऐसे ह्रदय दिखाई पड़ते हैं, जो आनंद से भरे हो, और न तो ऐसे जीवन दिखाई पड़ते हैंं जिनमें प्रेम का संगीत हों। ये जो इतनी उदास, इतनी दुख से भरी हुई, और पीड़ा से भरी हुई स्थिति हैं। इसके लिए क्‍या किया जाए। क्‍या हो, कौन सा रास्‍ता, कौन सी विधि मनुष्‍य को प्रफुल्लित कर सकेंं, आनंदित कर सके। 



मैंने कहा ये कोई स्‍त्री या पुरूष का कोई अलग प्रश्‍न नहीं है। ये तो जीवन का प्रश्‍न हैं। और सभी के लिए हैं। एक ने इस संबंध में भी पूँछा हैं। की जीवन में अशंति हैं। शांति कैसे उपलब्‍ध होंं।

जीवन में अशांति है - यह तो हमें अनुभव होता हैं। लेकिन शायद ये हमें दिखाई नहीं पड़ता कि उस अशांति को हमारे अतिरिक्‍त और कोई पैदा नहीं करता हैं। जीवन में अशांति का एक तो मौलिक कारण यहीं हैं। कि जब भी अशांति होती हैं। तब हम सोचते हैंं काेई और अशांति को पैदा कर रहा हैं। जो व्‍यक्ति भी इस भाषा में सोचता हैंं कि काेई और अशांति को पैदा कर रहा हैं। उसके जीवन में शांति कभी नहीं हो सकेगी। 


एक छोटी सी कहानी मैं आपसे कहूँ। उससे मेरी बात समझ आए और आगे बढ़ा जा सके। एक छोटे से गांव में सुबह होने को थी सूरज निकलने को था। एक घुड़सवार आके रूका। गांव के बाहर ही गांव के दीवार के बाहर ही एक बूँढ़ा आदमी बैठा हुआ था। उस घोड़सवार ने उस बूँढ़े आदमी से पूँछा । मैं इस गांव में रहने का निर्णय करके आया हूँ, पुराना गांव मैने बदल लिया। मैं इस गांव में रहना चाहता हूँ। क्‍या आप बता सकेंगे कि इस गांव के लोग कैसे हैं। उस बूँढे आदमी ने बड़ी समझदारी की बात पूछी। इसके पहले की मैंं बताऊँँ इस गांव के लोग कैसे हैं। मैं तुमसे ये पूँछना चाहूंगा कि जिस गांव को तूम छोड़ कर आ रहे हो उस गांव के लोग कैसे हैं। उस आदमी ने कहा ऐसे पूँछने से क्‍या प्रयोजन। उस बूँढ़े ने कहा - इसके बिना उत्‍तर देना बढ़ा मुश्किल हैं। मुझे बताओं जिस गांव को तूम छोड़के आते होंं उस गांव केे लाेग कैसे थे। उस व्‍यक्ति ने कहा उनका नाम भी मेरी स्‍मृति और मेरे ह्रदय को घृणा से भर देता हैं। उस गांव के लोग बहुत दुष्‍ट थे बहुत बुरे थे। उन्‍होंने ही मुझे बहुत अशांत और पीडित किया हैं। कि उनके कारण मुझे उस गांव को छोड़कर आना पड़ा हैं। उस गांव के लोगों का नाम न लेें। उनका नाम लेते ही मेरे ह्रदय हैंं घृणा भर आती हैं। उस बूंढे आदमी ने कहा - मित्र तूम किसी और गांव में जाओं इस गांव के लोग उस गांव से भी ज्‍यादा बुरे हैं। ये गांव तूम्‍हें ठीक नहीं हो सकेगा। मैं 70 वर्ष से इस गांव में रहता हूँ। मैं लोगो को जानता हूँ वो बहुत बुरे हैं। तूम्‍हारे गांव के लाेग जिनको तूम बुरा कह रहे हो इनके सामने कुछ भी बुरे नहीं है। तूम कोई और गांव जाओं। वो घोड़सवार आगे बढ़ गया। और उसके पीछे ही एक बैलगाड़ी़ आके रूकी उसमें भी एक परिवार आया हुआ था। और उस परिवार ने भी उस बूंढे से पूछा कि इस गांव के कैसे लोग है, हम अपने गांव को छोड़के आते हैं और इस गांव में रहना चाहते हैं। बूंढे ने फिर वहीं प्रश्‍न दोहराया - उसने कहा, मुझे बताओं तूम जिसे गांव को छोड़कर आते हो, वहां के लोग कैसे थे। उसने कहां उनका नाम उनकी स्‍मृति मेरे ह्रदय को आनंद से भर देती है। उतने भले लोग पृथ्‍वी पर शायद ही कहीं हों। मेरा चित्‍त अभी दुखी हैंं और मेरे आंसू अभी गिले हैंं उनको छोड़कर आना पड़ा हैं। इससे मेरे प्राण बहुत बहुत दुखी हैं। उस बूंढे ने कहा आओं हम तूम्‍हारा स्‍वागत करते हैं। इस गांव के लाेगों को तूम उस गांव से बेहतर पाओगे। 70 वर्ष का मेरा अनुभव हैं। इतने अच्‍छे आदमी और कहीं भी नहीं हैं। 

ये छोटी सी कहानी मैं आपसे कहना चाहता हूँ। वहीं गांव था। लेकिन उन दो अलग-अलग लोगों को उस बूंढे ने अलग-अलग उत्‍तर दिये हैं। इस बात पर निर्भर करता है कि गांव कैसा होगा। इस बात पर निर्भर करता हैंं कि मैं कैसा हूँ। अगर मैं अशांत हूँ। तो ये मत सोचना की जीवन में सब जगह बुरे लोग हैं। बुरी परिस्थितियां हैं इसलिए अशांति हैं। अशांति का बुनियादी कारण हैं मनुष्‍य के खुद के भीतर और उसके व्‍यक्तित्‍व में होता हैं। इसी जमीन पर इसी तरह की परिस्थितियों में वे लाेग भी हैं जो बहुत आनंदित हैं। महावीर, बुद्ध, कृष्‍ण और क्राइस्‍ट भी हमारे बीच पैदा होते हैं। और उनके जीवन में अपूर्व आनंद हैं। यही परिस्थितियां हैं, यही पृथ्‍वी हैं, यही आकाश हैं, यही चांद तारे हैं, यही लोग हैं। इनके बीच ही कोई व्‍यक्ति परिपूर्ण आनंद को उपलब्‍ध होता हैं, शांति को उपलब्‍ध होता हैं। और हम हैंं इन्‍हीं लोगोंं के बीच दुखी और पीडित हो जाते हैं। जरूर हमारे देखने में और  हमारे होने में कुछ बेदोघ हैं। हमारे व्‍यक्तित्‍व में, हमारे सोचने के ढंग में, हमारी जीवन विधि मेंं कोई भूल होगी। हमारे सोचने का ढंग हमारे जीवन जीने की पद्धति में कोई बुनियादी खामियां होंगी। अन्‍यथा ये कैसे हो सकता हैं। 

एक फकीर था। जपान में, 1930 में वहां ये घटना घटी। आधी रात को अपने झोपड़ेे में कुछ पत्र लिख रहा था। किसी आदमी ने द्वार को धक्‍का दिया। द्वार अटका हुआ था, खुल गया। जो आदमी भीतर आया उसने शायद सोचा होगा कि फकीर सोया हुआ हैं। लेकिन फकीर जागा हुआ था, आधी रात में। वो चोर था, जो आया था वो घबड़ा गया। उसने जल्‍दी से अपना छुरा बाहर निकाल लिया। उस फकीर ने कहा मित्र छुरे को अंदर ही रखों। यहांं कोई बुरे लोग नहीं रहते है कि छुरा निकालने की जरूरत पड़े। छुरे को बन्‍द ही रखों और आओं। कैसे इतनी रात को आना हुआ। वो चोर बहुत घबड़ा गया। उसने कहा आप पूछते है तो मैं कह दूँ। मैं तो चोर हूँ और चोरी करने के विचार से आया हूँ। उस फकीर की आंखों में आंसू आ गये। उस चोर ने पूंछा क्‍या हुआ आप रोते क्‍यूं हैं। उस फकीर ने कहा इसलिए रोता हूँ, क्‍योंकि तूम इतनी पीड़़ा में और दुख में नहीं होओगे कि तूम चोरी करने के लिए तैयार हुए। और तूम इतनी मजबूरी में नहीं होगे कि आधी रात को गांव को छोड़कर एक फकीर की झोपड़ी में चाेरी करने आए। तूम्‍हरी यह स्थिति मेरे मन में बहुत दुख और पीड़ा़ पैदा करती हैं। और इस कारण भी में दुखी हूँ कि मेरे पास भी कुछ ज्‍यादा नहीं हैं। बस दस पांच रूपये पड़े हैं। तो तूम उन्‍हें निकाल लो और ले जाओं। सामने के ठाठ पर से उसने रुपये उठाये, जब वो उसने जाने को हुआ तब उस फकीर ने कहा कृपा करों - कम से कम एक रूपया वापस छोड़ दो मुझे कल सुबहा जरूरत पड़ सकती हैं। उसने एक रूपया छोड़ और वह चोर बाहर निकला। बाहर निकलते वक्‍त फकीर ने फिर उससे कहा एक काम और करोंं, कम से कम मुझे धन्‍यवाद तो देते जाओ। उस चाेर ने घबड़ाहट में धन्‍यवाद दिया और चला गया। और बाद में वो पकड़ गया। अदालत में मुकदमा था, और भी बहुत चोरियां थी। इस चोरी का भी अदालत को पता चल गया। तो उस फकीर को अदालत में जाना पड़ा। चोर घबड़ाया हुआ था। और सारे लोगों की गवाहीयों का उतना मूल्‍य नहीं था। लेकिन अगर फकीर कह देगा कि ये चाेरी करने आया हैं। उस फकीर की बड़ी प्रतिष्‍ठा थी। सैकड़ो लोग उसको पूजते थे। उसकी बात को तो कोई गलत नहीं मानेगा। वह बहुत डरा हुआ था। फकीर अदालत में गया, मजिस्‍ट़ेट ने पूछा कि क्‍या आप इस आदमी को पहचानते हैं। उस फकीर ने कहा बहुत भलि भांति यह तो मेरेे पुराने परिचित और मित्र हैं। चोर घबड़ाया - मजिस्‍ट्रेट ने पूंछा की कभी उन्‍होंने आपके यहां चोरी की। उस फकीर ने नहीं, उन्‍होंने कभी मेरे यहां चोरी नहीं की। हॉं एक बार ये मजबूरी में मेरे यहां रात को आए थे। तो मैंने इनको कुछ रूपए दिये थे। और बदले में इन्‍होंने मुझु धन्‍यवाद दिया था। बात वही समाप्‍त हो गई थी। चोरी का कोई सवाल नहीं हैं। चोर तो बहुत हैरान हुआ। बाद में जब वो छूट गया तो वह उस फकीर के पास गया। और उसने कहा मैं तो बहुत हैरान हूँ। एक चोर को भी आप एक चोर न समझ पाएं। उस फकीर ने क्‍या कहा- उस फकीर ने कहा कि जिस दिन मेरे भीतर का चोर मर गया। उस दिन के बाद किसी को चोर समझना बहुत मुश्किल हो गया हैं।

 हमारे व्‍यक्तित्‍व में जो नहीं वो हमे ये सारी दुनिया नहीं दे सकती। और जो हमारे व्‍यक्तित्‍व में हैं उसे सारी दुनिया की ताकत हमसे छीन भी नहीं सकती। अगर आप अशांत है तो इस बात को समझना कि कोई ओर आपको अशांत नहीं कर रहा हैं। कोई और कारण नहीं है कि आपको अशांत कर रहे हो। आप अशांत है यह आपके व्‍यक्तित्‍व की किसी बुनियादी भूल के कारण हैं। अगर  ये बात ख्‍याल में न आए तो हम परिस्थितियों को बदलने में, व्‍यक्तियों को बदलने में जीवन को गवां देते है। और स्‍वयं को बदलने की तरफ दृष्टि पैदा नहीं होती। अशांति है - तो आप कारण हैं। शांति होगी तो आप कारण होंगे। किन बातो से अशांति पैदा होती हैं, व्‍यक्तित्‍व में। जीवन के प्रति अंधकार पूर्ण दृष्टि से अशांति पैदा होती हैं। जीवन के प्रति अलोक पूर्ण दृष्टि से शांति पैदा होती हैं। क्‍या मेरा अर्थ हैं - अंधकरापूर्ण दृष्टि से। जीवन को देखने का ढंग, जीवन के प्रति नजर दो प्रकार के हो सकते हैं। 

मैं एक घर में मेहमान होता था। जब मैं जाता तो उस परिवार के लोग मुझे बहुत प्रेम करतें। उस घर की ग्रहणी तो इतना प्रेम करती कि जब मैं उनके घर में जाता तो जिस दिन में जाता उसी दिन से वह रोना शुरू कर देती और मैं बहुत हैरान हुआ। मैने पूंछा कि ये रोना क्‍यों शुरू कर देती हो मेरे आने से। उसने कहा कि - जैसे ही आप आते हो मुझे आपके जाने का डर और 2 दिन बाद आप चले जायेंगे। इसकी पीड़ा और दुख मुझे होने लगता हैं। कि जब तक रहते हैं मैं सिर्फ रोती रहती हूँ। 

एक ओर घर में मैं ठहरता था। कभी दिन को जाता तो कभी 2 दिन को उनके घर रूकता। उस घर में भी जो परिवार था बहुत प्रेम करता। मैने उनसे पूंछा की जब मैं आता हूँ, तब आप रोते हैंं कि नई। उस घर की ग्रहणी ने कहा जब आप होते है तो हम आनंदित होते हैं। और जब आप चले जाते हैं। तो अत्‍यंत आनंद आपके आने की प्रतीक्षा करते हैं। मैने उनसे कहा जब मैं आपके घर नहीं रहता हूँ, तब - तो उसने कहा मैं प्रतीक्षा करती हूँ आनंद से आपके पुन: आने की। जब आप होतेे है तब होने का आनंद। जब आप नहीं होते तब आने की प्रतीक्षा की प्रीत पूर्ण आनंद। 

  

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