कबीरदास 15वीं शताब्‍दी के भारतीय रहस्‍यवादी कवि और संत थे। उन्‍होंने समाज में फैली कुरीतियों, कर्मकाण्‍ड और सामाजिक बुराईयों की कड़ी आलोचना की। संत कबीरदास के दोहे गागर में सागर के समान हैं। उनका गूढ़ अर्थ समझकर यदि कोई उन्‍हेंं अपने जीवन में उतारता हैं, तो निश्‍चय ही उसे मन की शांति प्राप्‍त होगी। हिंदी साहित्‍य के हजार वर्षों के इतिहास में गोस्‍वामी तुलसीदास के बाद कबीरदास जैसा व्‍यक्तित्‍व लेकर कोई लेखक उत्‍पन्‍न नहीं हुआ। 


मन में धीरज रखने से सब कुछ होता हैं, अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे, तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा। - संत कबीरदास 


हम जैसा भोजन करते हैं, वैसा ही हमारा मन हो जाता हैं। और हम जैसा पानी पीते हैं, वैसी ही हमारी वाणी हो जाती हैं। - संत कबीरदास 



सिर्फ बढ़े होने से कुछ नहीं होता। उदाहरण के लिए खजूर का पेड़, जो इतना बड़ा होता हैं, पर न तो किसी यात्री को धूप के समय छाया दे सकता हैं, और न हीं उसका फल कोई आसानी से तोड़कर अपनी भूख मिटा सकता हैं। - संत कबीरदास 

सबके बारे में भला सोचो। न किसी से ज्‍यादा दोस्‍ती रखो, और न ही किसी से दुश्‍मनी - संत कबीरदास 



अगर पत्‍थर की मूर्ति की पूजा करने से भगवान मिल जाते तो मैं पहाड़ की पूजा कर लेता हूं। उसकी जगह कोई घर की चक्‍की की पूजा नहीं करता, जिसमें अन्‍न पीसकर लोग अपना पेट भरते हैं। - संत कबीरदास

वाणी एक अमूल्‍य रत्‍न के समान हैं। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर अर्थात सोच समझकर ही मुंह से बाहर आने देना चाहिए। - संत कबीरदास 


कुछ लोग बहुत पढ़ लिखकर दूसरों को उपदेश देते हैं, लेकिन खुद अपनी सीख ग्रहण नहीं करते। ऐसे लोगों की पढ़ाई और ज्ञान दोनों व्‍यर्थ हैं। - संत कबीरदास
 

जब मैं इस संसार में बुराई खोजने निकला, तो मुझे कोई बुरा नहीं मिला। परन्‍तु जब मैंने अपने मन में झांक कर देखा, तो पाया कि इस संसार में मुझ से बुरा कोई नहीं हैं। - संत कबीरदास 


नहाया धोया पर अगर मन के मैल को साफ ना किया तो क्‍या फायदा। जिस प्रकार मछली हमेशा पानी में ही रहती है फिर भी उससे बदबू ही आती रहती है। - संत कबीरदास 


बड़ी-बड़ी पुस्‍तकें पढ़कर इस जग में न जाने कितने लोग मृत्‍यु के द्वार पहुंच गए, पर सभी बुद्धिमान न हो सकें। - संत कबीरदास 


कबीर मानते हैं कि अगर कोई प्रेम के केवल ढाई अक्षर ही अच्‍छी प्रकार पढ़ ले अर्थात प्‍यार का वास्‍तविक रूप पहचान ले तो वही सच्‍चा ज्ञानी हैं। - संत कबीरदास 


जिस तरह चिडि़या की चोंच भर पानी ले जाने से नदी के जल में कोई कमी नहीं आती उसी तरह जरूरतमंद को दान देने से किसी के धन में कोई कमी नहीं आती। - संत कबीरदास 


कौवा किसी का धन नहीं चुराता, फिर भी लोगों को वह पसंद नहीं। और कोयल किसी को धन नहीं देती फिर भी वह सबको पसंद है। - संत कबीरदास  


यह फर्क सिर्फ बोली का है। कोयल अपनी मीठी बोली से, सबके मन को भा जाती हैं। - संत कबीरदास 


जिस तरह दीपक की सुनहरी और लहराती लौ की ओर आकर्षित होकर कीट-पतंगे जल मरते हैं, उसी प्रकार लोग विषय वासना की तेज लहर में बहकर ये तक भूल जाते हैं कि वे डूब मरेंगे।  - संत कबीरदास 


जो कल करना है, उसे आज करो, और जो आज करना है, उसे अभी करो। जीवन बहुत छोटा होता है अगर पल भर में समाप्‍त हो गया तो क्‍या करोगे।  - संत कबीरदास 


मैं दुनिया के सभी लोगों के साथ लड़ सकता हूं, पर अपनों के साथ नहीं। मुझे अपनों के साथ जीतना नहीं, बल्कि जीना हैं।  - संत कबीरदास 


जो व्‍यक्ति इस संसार में बिना कोई कर्म किए पूरी रात को सोते हुए और सारे दिन को खाते हुए की व्‍यतीत कर देता है। वो अपने हीरे के समतुल्‍य अमूल्‍य जीवन को कौडि़यों के भाव व्‍यर्थ ही गंवा देता हैं। - संत कबीरदास 


जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्‍वभाव को साफ करता हैं। - संत कबीरदास 


पांव के नीचे पड़े हुए तिनके की कभी निंदा मत क‍िजिए। क्‍योंकि जब यही तिनका आंख में चला जाता है, तो बहुत दर्द होता है। ठीक उसी प्रकार कमजोर और गरीब लोगों की निंदा नहीं करनी चाहिए। क्‍योंकि समय बड़ा बलवान है। कोई भी कहीं भी पहुंच सकता हैं। - संत कबीरदास 



कुछ लोग वर्षो तक हाथ में माला लेकर फेरते हैं लेकिन उनका मन नहीं बदलता। अर्थात उनका मन अटी और प्रेम की ओर नहीं जाता। ऐसे व्‍यक्तियों को माला छोडकर अपने मन को बदलना चाहिए और सच्‍चाई के रास्‍ते पर चलना चाहिए। - संत कबीरदास 

जो जितनी मेहनत करता है उसे उसका उतना फल अवश्‍य मिलता हैं। - संत कबीरदास 

गोताखोर गहरे पानी में जाता है, तो कुछ लेकर ही आता है लेकिन जो डूबने के डर से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं, वे कुछ नहीं कर पाते हैं। - संत कबीरदास 

धर्म करने से धन नहीं घटता। देखों नदी सदैव बहती रहती है परन्‍तु उसका जल घटता नहीं। - संत कबीरदास 

जब तक यह देह है तब तक तू कुछ-न-कुछ देता रह। जब देह धूल में मिल जाएगी तब कौन कहेगा कि दो। - संत कबीरदास 

यह मनुष्‍य का स्‍वभाव है, कि जब वह दूसरों के दोष देखकर हंसता है तब उसे अपने दोष याद नहीं आते, जिनका न आदि है न अंत। - संत कबीरदास 

जो लोग गुरू को दूसरा व्‍यक्ति समझते हैं, वे लाेग अंधे हैं। क्‍योंकि जब भगवान रूठ जाते हैं, तो गुरू के पास ठिकाना मिल सकता हैं। लेकिन गुरू के रूठने पर कहींं ठिकाना नहीं मिल सकता। - संत कबीरदास 

जिस प्रकार चक्‍की के दो पाटों के बीच में कोई भी अनाज साबुत नहीं बचता। ठीक उसी प्रकार जीवन और मुत्‍यु के बीच में कोई भी नहीं बचता। सबको एक दिन जाना पड़ता है। लेकिन फिर भी लोग अंजान बने रहते हैं। - संत कबीरदास 

जैसे तिलों में तेल छिपा रहता है। जैस चकमक में आग छुपी रहती हैं। उसी प्रकार अपने अंदर भी ईश्‍वर का वास है। हमें कहींं बाहर भटकने की जरूरत नहीं हैं। अगर आप ढूंढ सको, तो ढूुंढ लो। - संत कबीरदास 

अच्‍छे लोगों की संगत कभी भी नुकसान नहीं करती। क्‍योंकि चंदन का वृक्ष चाहे कितना ही छोटा क्‍यों ना हो, वह नीम का वृक्ष नहीं कहलाएगा। उससे अच्‍छी खुशबू ही आएगी और वह आसपास के वातावरण को भी सुवासित कर देगा। - संत कबीरदास 

सज्‍जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्‍य होता हैं न कि उसकी म्‍यान का। - संत कबीरदास 

यह शरीर तो सब जंगल के समान है। और हमारे कर्म कुल्‍हाड़ी के समान। इस प्रकार हम खुद अपने आपको काट रहे हैं। - संत कबीरदास  

न तो अधिक बोलना अच्‍छा है, न जरूरत से ज्‍यादा चुप रहना ही ठीक हैं। जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्‍छी नहीं, और बहुत अधिक धूप भी अच्‍छी नहीं। - संत कबीरदास 

जैस पानी के बुलबुले होते हैं, उसी प्रकार मनुष्‍य का शरीर भी क्षणभंगुर है। जैसे सुबह होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसेे ही ये देह भी एक दिन नष्‍ट हो जाएगी। - संत कबीरदास  

जैसे चन्‍दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं फिर भी वह अपनी शीतलता नहीं छोडता उसी प्रकार सज्‍जन पुरूष को चाहे करोड़ों दुष्‍ट मिलें फिर भी वह अपने भले स्‍वभाव को नहीं छोड़ता। - संत कबीरदास 

इस संसार में ऐसे सज्‍जनों की जरूरत है, जैसे अनाज साफ करने वाला सूप होता है। जो सार्थक को बचा लेता है और निरर्थक को उड़ा देता हैं। - संत कबीरदास 

जहां पर आपकी योग्‍यता और गुणों का प्रयोग नहीं होता वहां आपका रहना बेकार हैं। जैसेे ऐसी जगह धोबी का क्‍या काम जहां पर लोगों के पास पहनने को कपड़े ही न हों। - संत कबीरदास 

समुद्र की लहर में मोती आकर बिखर गए। बगुला उनका भेद नहीं जानता। परन्‍तु हंस उन्‍हें चुन-चुन कर खा रहा हैं। इसका अर्थ यह है, कि किसी भी वस्‍तु का महत्‍व जानकार ही जानता है। - संत कबीरदास 

अज्ञानी व्‍यक्ति काम कम, और बाते अधिक करते हैं। ऐसे लोग खुद अपना तर्क रखने के बजाय सुनी सुनाई बातों को ही रटते रहते हैं। - संत कबीरदास 

कुछ लोग भगवान का ध्‍यान फल और वरदान की आशा से करते हैं, भक्ति के लिए नहीं। ऐसे लोग भक्‍त नहीं व्‍यापारी हैं, जो अपने निवेश का चौगुना दाम चाहते हैं। - संत कबीरदास 

 

मूर्ख का साथ मत करों। मूर्ख लोहे के सामान है जो जल में तैर नहीं पाता डूब जाता है। - संत कबीरदास 

संगति का प्रभाव इतना पडता है, कि आकाश से एक बूंद, केले के पत्‍ते पर गिर कर कपूर बन जाती है, सीप के अन्‍दर गिर कर मोती बन जाती है। और सांप के मुख में पड़कर विष बन जाती हैं। - संत कबीरदास 

यदि कार्य उच्‍च कोटि के नहीं हैंं तो उच्‍च कुल में जन्‍म लेने से क्‍या लाभ ? सोने के कलश में यदि शराब भरी हो, तो साधु उसकी निंदा ही करेंगे। - संत कबीरदास  

गुरू का स्‍थान ईश्‍वर से भी ऊपर है। अगर दोनों एक साथ खड़े हों, तो पहले गुरू को प्रणाम करना चाहिए। क्‍योंकि गुरू की शिक्षा के कारण ही, भगवान के दर्शन हुए हैं। - संत कबीरदास  

यह शरीर कच्‍चा घड़ा हैं, जिसे तू साथ लिए घूमता फिरता है जरा-सी चोट लगते ही य‍ह फूट जायेगा। और कुछ भी हाथ नहीं आएगा। - संत कबीरदास 


 

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