न हि कश्र्चित्‍क्षणमपि जातु तिष्‍ठत्‍यकर्मकृत् ।

                     कार्यते  हा्वश:  कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै:।। ५ ।। 

           नि:सन्‍देह कोई भी मनुष्‍य किसी भी काल में क्षण मात्र भी बिना कर्म कियेे नहीं रहता,     क्‍योंकि सारा मनुष्‍यसमुदाय प्रकृतिजनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्‍य किया   जाता है।

प्रश्र - काेई भी मनुष्‍य किसी भी काल में क्षण्‍मात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता, इस वाक्‍य का क्‍या भाव है।

उत्‍तर - इससे भगवान् ने यह भव दिखलाया है कि उठना, बैठना, खाना, पीना, सोना, जागना, सोचना, मनन करना, स्‍वप्र देखना, ध्‍यान करना और समाधिस्‍थ होना - ये सब के सब कर्म के अन्‍तर्गत आते है। इसलिए जब तक शरीर रहता है, तब तक मनुष्‍य अपनी प्रकृति के अनुसार कुछ न कुछ कर्म करता ही रहेगा। कोई भी मनुष्‍य क्षण भर भी कभी स्‍वरूप से कर्मों का त्‍याग नहीं कर सकता। अत: उनमें कर्तापनका त्‍याग कर देना या ममता, आसक्ति और फलेच्‍छा का त्‍याग कर देना ही उनका सर्वथा त्‍याग कर देना है। 

प्रश्र - यहॉ 'कश्र्चित्' पदमें गुणातीत ज्ञानी पुरूष भी स‍म्‍मलित है या नहीं

उत्‍तर - गुणातीत ज्ञानी पुरूष का गुणों से या उनके कार्य से कुछ भी समबन्‍ध नहीं रहता, अत: वह गुणों के वश में होकर कर्म करता है, यह कहना नहीं बन सकता। इसलिये गुणातीत ज्ञानी पुरूष 'कश्र्चित्' पद के अन्‍तर्गत नहीं आता। तथापि मन, बुद्धि और अन्द्रिय आदि का संघतरूप जो उसका शरीर लोगों की दृष्टि में वर्तमान है, उसके द्वारा उसके और लोगों के प्रारब्‍धानुसार नाममात्र के कर्म तो होते ही हैं, किंतु कर्तापन का अभाव होने के कारण वे कर्म वास्‍तव में कर्म नहीं है। हां, उसके मन, बुद्धि और इन्द्रिय आदि के संघतरूप को 'कश्र्चित्' के अन्‍तर्गत मान लेने में कोई आपत्ति नहीं है, क्‍योंकि वह गुणों का कार्य होने से गुणों से अतीत नहीं है, बल्कि उस शरीर से सर्वथा अतीत हो जाना ही ज्ञानीकां गुणातीत हो जाना है। 

प्रश्र - 'सर्व:' पद किसका वाचक है और उनका गुणों के वश में होकर कर्म करने के लिए बाध्‍य होना क्‍या हैं

उत्‍तर - 'सर्व:' पद समस्‍त प्राणियों का वाचक होते हुए भी यहॉ उसे खास तौर पर मनुष्‍य-समुदायका वाचक समझना चाहिए क्‍योंकि कर्मो में मनुष्‍यका ही अधिकार है। और पूर्वजन्‍मों के किये हुए कर्मों के संस्‍कारजनित स्‍वभाव के परवश होकर जो कर्मो में प्रवृत्‍त होना है, यही गुणों के वश होकर कर्म करने के लिये बाध्‍य होना है।

प्रश्र - 'गुणै:' पद के साथ 'प्रकृतिजै:' विशेषण देने का क्‍या अभिप्राय है

उत्‍तर - सांख्‍यशास्‍त्र में गुणों की साम्‍यावस्‍थाका नाम प्रकृति माना गया है, परंतु भगवान् के मत में तीनों गुण प्रकृति के कार्य हैं - इस बात को स्‍पष्‍ट करने के लिये ही भगवान् ने यहॉ 'गुणै:' पद के साथ 'प्रकृतिजै:' विशेषण दिया है। इसी तरह कहीं 'प्रकृतिसम्‍भवान्' (३।), कहीं 'प्रकृतिजान्' (३।), कहीं 'प्रकृति-सम्‍भवा:' (४।), और कहीं 'प्रकृतिजै:' (८।),  विशेषण देकर अन्‍यत्र भी जगह-जगह गुणों को प्रकृति का कार्य बतलाया है। 

प्रश्र - यहॉ 'प्रकृति शब्‍द किसका वाचक है

उत्‍तर - समस्‍त गुणों और विकारों के समुदायरूप इस जड दृश्‍य - जगत् की कारणभूता जो भगवान् की अनादि सिद्ध मूल प्रकृति है - जिसको अव्‍यक्‍त, अव्‍याकृत और महद्ब्रहाृ भी कहते हैं - उसी का वाचक यहॉं  'प्रकृति' शब्‍द हैं।