सद्गुरू जग्‍गी वासुदेव
''विकास की प्रक्रिया में क्‍या ये सच हैं कि इंसान के रूप में हम सबसे ऊपर हैं। सभी जीवों में हम सर्वश्रेष्‍ठ हैं। शायद थोड़ा और करने की जरूरत हैं। मगर फिलहाल हम सबसे ऊपर हैं। मगर क्‍या यह भी सच हैं कि जब लोग कहते हैं - इंसान,  तो हमेशा उनका मतलब होता हैं अरे मैं तो सिर्फ इंसान हूँ। इंसान शब्‍द को हमेशा उसकी सीमाओं से जोड़ा जाता हैं। बहुत कम लोगों में मैं इंसान हूँ का उपयोग इंसान की विशालता बताने के लिए किया हैं। हमेशा इंसान होने की सीमायें तो कही न कही हम बुनियादी मुद्दो से चूक गये। मुद्द यह हैं -  क्‍या यह सच हैं कि इस धरती पर हर जीव एक कीड़ा, एक चिडि़या, एक जानवर जिनका दिमाग हमसे लाख गुना छोटा हैं वे अपनी जीवन प्रक्रियांं बड़ेे अच्‍छे से चलाते हैंं - क्‍या ऐसा हैं। जब मैं जीवन प्रक्रिया कहता हूँ तो इसका मतलब है कि जैसे हम पैदा हुए वो भी वैसे पैदा होते है। हम बड़े हुए वो भी बड़े होते हैं। हमने जीवन चलाया वो भी जीवन चलाते हैं।''

हमने बच्‍चे पैदा किए वो भी बच्‍चे पैदा करते हैं। हम ये सब बड़े झमेले क साथ करते हैं। वे इसे यूंं कर लेते हैं। हर मामूली चीज के लिए हम बड़ा हमंगा करते हैं। वे आराम से कर रहे हैं। विभिन्‍न जीने मरने की तमाम प्रक्रियाएं वे बिना किसी झमेले के कर रहे हैं। हम हर चीज बड़े झमेले के साथ करते हैं।

 क्‍या ये बुद्धिमत्‍ता का सबसे ऊंचा स्‍तर दिखाता हैं। हम खुद को सबसे बुद्धिमान मानते हैं। और इसमें शक नहीं कि हमारी न्‍यूरोलॉजिकल प्रक्रिया इस धरती पर सबसे ज्‍यादा विकसित हैं। हमारे पास सबसे विकसित न्‍यूरोलॉजिकल सिस्‍टम हैं। 

जो हमे बहुत बेहतरीन तरीके से महसूस करना, अनुभव करना, समझना, और व्‍यक्‍त करना चाहिए। मगर धरती पर कोई दूसरा जीव इंसान की तरह संघर्ष नहीं कर रहा। ऐसा इसलिए हैं क्‍योंकि आपको एक सुपर कम्‍प्‍यूटर मिला हैं। क्‍या आप मुझसे सहमत हैं कि यह धरती का सबसे परिष्‍कृत यंत्र हैं। आईफोन नहीं ए आई,  पर अब सवाल यह की आपने युजर मेन्‍युल पढ़ा हैं। बस लोगों ने यूजर मेन्‍युल ही नहीं पढ़ा - धरती की सबसे जटिल मशीन का।  पर कैसे भी गलतियां करते हुए उपयोग करने की कोशिश कर रहे हैं। हर चीज एक समस्‍या हैं। मुझे एक चीज बताइएं जिससे की इंसान दुखी न हो। अगर वे गरीब हैंं तो वे गरीबी से दुखी हैं, अब उन्‍हें अमीर बना दीजिए, अब वे टैक्‍स से दुखी हैं। अगर पढ़े-लिखे नहीं है तो दुखी है, उन्‍हें स्‍कूल में डाल दीनिए भारी दुख। शादी नहीं हुई तो दुख, उनकी शादी करा दीजिए - महादुख। बच्‍चे नहीं हैं उनसे कुछ लोग दुखी हैं, अब बच्‍चे हैं हर रोज दुख। तो आप जीवन के हर पहलु से दुखी लगते हैं। तो अगर हम आपको मौत दे दें। तो क्‍या आप खुशी-खुशी जाएंगे - नहीं आप दुखी हो जायेंगे। तो मुझे एक चीज बताइए जिससे हम दुखी नहीं हैं। अब लोग फिलोसीफी बनाते हैं - जीवन दुख हैं। नई -नई जीवन दुख नहीं हैं। नहीं यह तो आनंद हैं। यह तो बस मौजूद हैं, ये शानदार प्रक्रिया हैं। अगर आप इसकी सवारी करते हैंं तो यह शानदार हैं। अगर आप इससे कुचले जाते हैं तो यह भंयकर लगता हैं। तो क्‍या आप जीवन की लहर पर सवार हैं। या इससे कुचले जा रहे हैं। यही सवाल हैं। तो इसके होने के लिए इंसान को क्‍या दुख हैं।


 मैं आपसे पूछता हूँ कि लाेगों के जीवन में कितना दुख असल में बाहर से आता हैं - जरा सा । बाकी वो खुद पैदा कर रहे हैं। अगर वे बैठते हैं तो दुख, खड़े होते हैं तो दुख। अगर कुछ होता हैं तो दुख अगर कुछ नहीं होता तो दुख। उनका दुख खुद उनकी अपनी ही मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया से हैं। आपके अपने ही विचार और भावनाएं यानी आपके सोचने और महसूस करने का तरीका इतना बड़ा दुख बन गया। आप कैसे सोचते और महसूस करते हैं क्‍या आपको तय नहीं करना चाहिए। आपके भीतर क्‍या होता हैं क्‍या उसे आपकी मर्जी से नहीं होना चाहिए। अब मैं आपसे पूछता हूँ क्‍या आप मुझे देख सकते हैं। हाथो से इशारा कीजिए मैं कहा हूँ। ओह आपने गलत बताया हैं। आपको पता हैं मैं मिस्टिक हूँ। अब ये रोशनी मुझ पर पढ़ रही हैं उल्‍टा होकर अब ये आपके लेंस से गुजरती हैं। रेटिना में उल्‍टा छवि बनाती हैं। आप ये सब जानते हैं, हे ना। अभी आप मुझे कहा देख रहे हैं - अपने भीतर हे ना। अभी आप मुझे कहा सुन रहे हैं - अपने भीतर। आपने ये सारी दुनिया कहा देेखी हैं - अपने भीतर। हर चीज जो आपके साथ हुई हैं - पीड़ा, दुख, या सुुुख आपके भीतर हुआ हैं। खुशी और गम आपके भीतर हुुए हैं। व्‍यथा और परमानंद आपके भीतर हुआ हैं। यहा तक की रोशनी और अंधेरा भी असल में आपके भीतर ही हुआ हैं। दुनिया में जो होता है वो भले ही आपकी मर्जी से न होंं। पर कम से कम आपके भीतर जो होता है उसे तो आपके हिसाब से होना चाहिए। तो आपके अन्‍दर जो होता हैं। वो अगर आपकी मर्जी से नहीं हो रहा तो बुनियादी रूप से हमने जीवन की प्रक्रिया को नहीं समझा। उसे बिना समझे अपने अस्त्तिव की बुनियादी चीजोें को समझे बिना हम जीने की कोशिश कर रहें हैं।


 क्‍या यह सच है कि पीड़ा और सुख दोनों आपके भीतर पैदा होते हैं। उसे बाहर से उकसाया जा सकता हैं। मगर सारा इंसानी अनुभव आपके भीतर से ही आता हैं। जो आपके भीतर से आ रहा हैं उसे आपके मुताबिक होना चाहिए। वरना आप खुद के काबू से बाहर होंगे। तो मेरा पूरा काम और जो चीज सिखायी जाती हैं। उसकी बुनियादी प्रकृति को इनर इंजिनियरिंग कहते हैं। मतलब हमने कई तरह से दुनिया को इंजिनियर किया हैं। जिसमें हमने खुद को जबरजस्‍त आराम और सुविधाएं दी हैं। क्‍या आप मेरी बात से सहमत हैंं कि हम असाधरण सुविधाओं का आनंद लेने वाली सबसे आरामदेह पीढ़ी हैं। जिसकी कोई पीढ़ी कल्‍पना भी नहीं कर सकती थी।  हां या न जो राजाओं के पास भी नहीं था। 100 साल पहले आज आम लोग उसका आनंद ले रहे हैं। तो ये सब मानवता पर बर्बाद हो रहा हैं। क्‍योंकि लोगों का जीवन का अनुभव भीतर नहीं हुआ। क्‍योंकि आपकी खुशहाली कभी बाहर से नहीं आएंगी। बाहर से आप आराम जुटा सकते हैं। सुविधाएं जुटा सकते हैं। पर खुशहाली पैदा नहीं कर सकते। खुशहाली सिर्फ आपके भीतर से पैदा हो सकती हैं। क्‍योंकि इंसानी अनुभव भीतर से पैदा होता हैं। इससे फर्क नहीं पड़ता की आपके अनुभव की प्र‍कृति क्‍या हैं। वो जो भी हो सुखद या दुखद दाेनों आपके भीतर से पैदा होते हैं। लेकिन अगर आपका खुद पर नियंत्रण हैं। तो आप अपने लिए खुशी पैदा करेंगे या दुख। ज्‍यादा से ज्‍यादा खुशी, अगर पीड़ा या आनंद में आपको एक चुनना हो तो आप अपने लिए क्‍या चुनेंगे। निश्चित ही आप अपने लिए सर्वाधिक खुशी चुनना चाहेंगे। 

आप अपने पड़ोसी के लिए क्‍या चाहते हैं इस पर बहस हो सकती हैं, इस आधार पर की उन्‍होंने आज क्‍या किया। मगर खुद क लिए जो चाहिए वह 100 फीसदी साफ हैं। इतनी साधारण चीज क्‍यों नहीं हो रही हैं। क्‍योंकि ये दिमागी ग‍ति‍विधी क्रमिक विकास की प्रक्रिया में नहीं हैं। ये एक नई घटना हैं। नई से मेरा मतलब हैं कुछ लाख साल पहले। पर विकास क पैमाने पर ये नई हैं। तो हमारे पास एक ऐसी बुद्धि हैं जिसके लिए हमारे पास एक स्थिर आधार नहीं हैं। आपको यातना देने के लिए किसी ओर दूसरे की जरूरत नहीं है हे ना, आप खुद ही काफी हैं। आपको कोई बाहरी मदद नहीं चाहिए। आप अकेले कही बैठकर वहीं नर्क बना सकते हैं। क्‍योंकि आपकी अपनी बुद्धि आपके खिलाफ हो गई हैं। इसे कई आकर्षक नामों से बुला सकते    हैं। आप इसे पीड़ा कहे डिपप्रेशन कहेंं कई अलग अलग तरह के रोगों के नाम दें। मगर दकअसल आपकी बुद्धि आपके खिलाफ हो गई हैं। एक बार आपकी बुद्धि आपके खिलाफ हो जाए, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको नहीं बचा सकती। क्‍योंकि हम आपके जहां भी ले जाए आप दुखी ही रहेंगे। कुछ लोग सोचते है कि वे एक दिन स्‍वर्ग जाएंगे वे ठीक सक रहेंगे। मैं पूछ रहा हूँ। क्‍या आपके पास कोई सबूत हैं कि आप पहले से ही स्‍वर्ग में नहीं है। और आप इसे बर्बाद नहीं कर रहे। आपके पास कोई सबुत हैं - नहीं हैं। शायद आप पहले ही स्‍वर्ग में है और उसकी दुर्गति कर रहें हैं। 

अगर आपका दिमाग आपके काबू से बाहर है तो आपको चाहे जहां ले जाया जाए। आप उसे खराब कर देंगे हे ना। जरा कल्‍पना कीजिए 100 साल पहले लोग इसी जगह पर कैसे रहते थे और आप कैसे रह रहे हैं। उसकी तुलना शिकायत करने के लिए क्‍या कुछ हैं। लेकिन हम हमेशा शिकायत करते रहते हैं। इस धरती पर कोई हमारी तरह भूनभुना नहीं रहा। तो समस्‍या बाहर की नहीं हैं। बाहरी हालात जरूर हैं। कुछ हालात हमारे मन मुताबिक होंगे कुछ नहीं होंगे ऐसा ही होता हैं। आपके परिवार में चाहे दो ही लोग हो तब भी क्‍या हर चीज आपकी मर्जी से होती हैं - नहीं वह कभी नहीं हो सकती। बाहरी चीजें पूरी तरह आपके हिसाब से कभी नहीं होंगी। कुछ हद तक हम इसे संभाल सकते हैं। लेकिन कम से कम जो आपके भीतर होता हैं उसे तो पूरी तरह आपकी मर्जी से होना चाहिए। अगर अभी आपके भीतर जो हो रहा हैं वो अगर आपकी मर्जी से हो रहा होता तो आप खुद को सुख के सर्वोच्‍च स्‍तर पर रखते या नहीं। उसके साथ बस इतना ही हुआ हांलाकिे मौत से भी सामना हुआ मगर कुछ फर्क नहीं पड़ा क्‍यों कि जो आपके भीतर हो रहा हैं वो आपके मर्जी से हो रहा हैं। कोई जादू नहीं बस इं‍जिनियरिंग। 


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