मानव जीवन धार्मिक रूढ़िवादिता एवं आध्यात्मिक विषयाे पर सार्वजनिक रूप से अपने विचारों को रखने वाले ओशो के बचपन का नाम चंद्रमोहन था। उनका जन्म एक जैन परिवार में हुआ। जनमानस को अपने विचारों एवं ज्ञान से प्रभावित कर उनके अनुयायियों द्वारा ओशो को भगवान श्री रजनीश के नाम से भी बुलाया जाता है।
ओशो का जीवन परिचय -
ओशो का जन्म 11 दिसम्बर 1931 को भारत के मध्यप्रदेश राज्य के जिले के कुचवाड़ा गांव में हुआ। ओशो बचपन से ही गंभीर एवं सरल स्वभाव के थे। कहां जाता है स्कुली शिक्षा के दौरान वे एक विरोधी प्रवृत्ति के छात्र थे जिन्हें पारंपरिक तरीके, रूढ़िवादी विचारधारा पसंद नहीं आती थी। इसलिए स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद किशोरावस्था में ओशो एक नास्तिक व्यक्ति बन चुके थे। ईश्वर और धार्मिक चीजों में उनकी बिल्कुल भी रूचि नहीं थी। वे स्वयं को नास्तिक मानते थे। स्कूली शिक्षा से ही वे एक कुशल वक्ता बनने की कोशिश करते थे। और भविष्य में वे इसमें सफल भी हुए उन्होंने अपनी आवाज से लाखों करोंड़ो लोागों को अपनी ओर आकर्षित किया। आगे चलकर उन्होंने एक अध्यापक के रूप में अपने सेवाएं दी। दर्शनशास्त्र के लेक्चरर के रूप में उन्होंने विश्व वि़द्यलयों में छात्रोंं को पढ़ाया। जिस वजह से उन्हें आचार्य रजनीश कहकर बुलाया जाने लगा। वर्ष 1962 में उन्होंने अपनी नौकरी त्यागकर अपना ध्यान अध्यात्म की ओर लगाया और लोगों को भी इसके प्रति आकृष्ट किया। कहा जाता है उन्होंने विभिन्न धर्मों जैसे हिंदू मुस्लिम, सिक्ख पर जनता को प्रवचन दिए। उनके महान वचनों ने कई लोगों को काफी प्रभावित किया और कई लोग उनके अनयाई भी बन गए। धर्म के अलावा वे कबीरदास, रविंद्रनाथ टैगोर, गौतम बुद्ध जैसे महापुरूषों के जीवन पर भी प्रवचन देते थे। उन्होंने भारत के विभिन्न स्थानों पर जाकर उस समय गांधीवाद औश्र समाजवाद के बारे में जोर शोर से अपनी विचारधारा को लोगों के सामने रखा। 1960 में उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया वे समाजवाद एवं गांधीवादी विचारधारा के कटु आलोचक थे। उन्होंने कई भाषणों के दौरान इसकी घोर आलाेचना भी की थी जिससे वे एक मुख्य विवादास्पद व्यक्ति बन चुके थे। इसके अलावा मानव जीवन में कामुकता के विषय पर वे स्वतंत्र दृष्टिकोण पसंद करते थे और अक्सर इस विषय पर खुलकर अपने विचारों को रखते थे। उनके इन विचारों से शुरूआत में उन्हें लोगों की तरफ से नाराजगी का भी सामना करना पड़ा लेकिन बाद में उन्हें इसके लिए स्वीकार भी किया गया। 1960 के दशक में वे भारत में एक प्रसिद्ध आध्यात्मि गुरू के रूप में जाने जाते थे। जिन्होंने आम जिंदगी छोड़कर अध्यात्म पर अपना जीवन समर्पित कर दिया। ओशो ने अपने जीवनकाल के दौरान सैकड़ों पुस्तकेंं पढ़ी लकिन उनमें से कई किताबें खूब विवादास्पद भी रही। जिसके प्रति जनता ने अपनी नाराजगी भी जाहिर की।
आचार्य रजनीश ओशो के धाकड़ विचार।
वह इंसान जो भरोसा नही करता वह परेशान, डरा हुआ और कमजोर
''जो लोग ये पूछते है की जीवन का क्या महत्व है? असल में ऐसे लाेगों
ने जीवन को ही खो दिया है। वे सिर्फ अपनी सांस लेने के वजह से ही जिंदा है बाकी अंदर से तो वो कब के मर चुके हैं।''

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